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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को जवाब देने के लिए एक हफ्ते का दिया वक्त

लॉकडाउन के दौरान कर्मचारियों को पूरा वेतन देने की अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को जवाब देने के लिए आज एक हफ्ते का वक्त दे दिया. लेकिन उद्योगों को आंशिक राहत देते हुए कहा कि फिलहाल इस तरह के मामलों में कोई कानूनी कार्रवाई न की जाए. इस मसले पर कोर्ट ने 8 मई को सरकार से जवाब मांगा था. लेकिन सरकार ने अभी जवाब दाखिल नहीं किया है.

कुछ उद्योगों की तरफ से दाखिल याचिका में कहा गया है, “आवश्यक सेवा से जुड़े उद्योगों को लॉकडाउन में काम करने की इजाजत दी गई है. लेकिन कई कर्मचारी केंद्र सरकार की अधिसूचना का फायदा उठाकर काम पर नहीं आ रहे हैं. पहले से संकट का सामना कर रहे उद्योगों को उन्हें पूरा वेतन देने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए.“

राजस्थान में जिंक खनन से जुड़े निर्माण कार्य को करने वाली कंपनी टेक्नोमिन कंस्ट्रक्शन ने केंद्र की अधिसूचना को चुनौती देते हुए इसे भेदभाव भरा बताया है. कंपनी ने कहा है जो मजदूर ड्यूटी कर रहे हैं और जो काम पर नहीं आ रहे हैं, उन्हें एक बराबर दर्जा कैसे दिया जा सकता है? ऐसा करना काम करने वाले मजदूरों के साथ भेदभाव होगा.”

टेक्नोमिन समेत 8 याचिकर्ताओं की दलील है कि उद्योग काम बंद हो जाने के चलते पहले ही संकट का सामना कर रहे हैं. ऐसे में जिन उद्योगों ने विशेष अनुमति के बाद काम करना शुरू कर दिया है. उन्हें सभी कर्मचारियों का वेतन देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. काम पर न आने वालों के वेतन में कटौती का आदेश बॉम्बे हाई कोर्ट ने दिया है. उसे पूरे देश में लागू करना चाहिए.”

याचिका में दलील दी गयी है, “जो कर्मचारी काम कर रहे हैं, वह पूरे वेतन के हकदार हैं. लेकिन जो काम नहीं कर रहे, कंपनी को उनका 30 फ़ीसदी वेतन देने को ही कहा जाना चाहिए. अगर सरकार चाहे तो बाकी 70 फीसदी कर्मचारी बीमा निगम या पीएम केयर्स फंड के पैसों से दे.” सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाओं को एक साथ जोड़ते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था.

आज इस मामले में सरकार को जवाब देना था. लेकिन उसने मसले पर विचार जारी होने की बात कहते हुए अतिरिक्त समय मांगा. कोर्ट ने अगले हफ्ते सुनवाई की बात कही. लेकिन लॉकडाउन के दौरान कर्मचारियों को पूरा वेतन देने में असमर्थता जता रहे उद्योगों को आंशिक राहत देते हुए कहा कि फिलहाल उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई न की जाए. कोर्ट ने कहा, “कई उद्योग छोटे और मझोले स्तर के हैं. सरकार को स्थिति के हिसाब से मदद के बारे में सोचना चाहिए.”

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